रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड को ऐसे ही सैन्य भूमि नहीं कहा जाता है. यहां का वीरों ने अपनी मातृ भूमि के लिए जान दी है. ऐसे ही एक वीर योद्धा की कहानी करीब 112 साल बाद आई है, जो कई फाइलों में दब कर रही गई थी, जिस पर आज पूरे उत्तराखंड को गर्व है. जिस योद्धा की हम बात कर रहे है, वो रुद्रप्रयाग जिले के रहने वाले है. उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में मातृ भूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार ने भी उन्हें सम्मानित किया था.
दरअसल, रुद्रप्रयाग के लिए अत्यंत गौरव और सम्मान का क्षण है. प्रथम विश्व युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सपूत राइफलमैन बहादुर सिंह रावत की शौर्यगाथा लगभग 112 वर्षों बाद दोबारा प्रकाश में आई है. लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में दबा उनका अद्वितीय बलिदान अब प्रमाणों सहित सामने आने के बाद जनपद ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड को गौरवान्वित कर रहा है.
राइफलमैन बहादुर सिंह रावत का जन्म वर्ष 1880 में रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम फलई तल्ला कालीफाट (वर्तमान ग्राम फलई, डाकघर अगस्त्यमुनि) में हुआ था. उन्होंने 26 अक्तूबर 1901 को मात्र 21 वर्ष की आयु में रॉयल गढ़वाल राइफल्स की द्वितीय बटालियन में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा का संकल्प लिया. वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ होने पर उनकी बटालियन को फ्रांस भेजा गया. इसी सैन्य दल में परमवीर योद्धा गब्बर सिंह नेगी भी सम्मिलित थे.
7 नवंबर 1914 को फ्रांस के यप्रेस क्षेत्र में हुए भीषण युद्ध के दौरान राइफलमैन बहादुर सिंह रावत ने अदम्य साहस, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए राष्ट्रहित में अपने प्राणों की आहुति दे दी. उनके सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने उनके परिजनों को ‘वीर स्मृति पदक’ (डेथ पेनी) प्रदान किया था. इस पदक पर अंकित शब्द हैं, ”उन्होंने स्वतंत्रता और सम्मान के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए”