हरिद्वार: कांवड़ मेले में हर साल श्रद्धालु अपनी आस्था को अलग अलग रूपों में प्रदर्शित करते हैं. इस बार हरिद्वार में एक ऐसी कांवड़ लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी, जिसे 10, 20, 50 और 100 रुपये के असली नोटों से सजाया गया था. दिल्ली के हर्ष विहार निवासी कांवड़िया दीपांशु इस विशेष कांवड़ को लेकर अपने नौ साथियों के साथ गंगाजल लेने हरिद्वार आए और गंगाजल भरकर दिल्ली के लिए रवाना हुए. इसी के साथ आस्था का एक अद्भुत नजारा भी देखने को मिला. यहां यूपी के बागपत निवासी दो सगे भाई संजीव कुमार और अनिल कुमार कांवड़ में अपने माता पिता को बैठाकर हरिद्वार पहुंचे.
कांवड़िए दीपांशु ने बताया कि पिछले वर्ष कांवड़ यात्रा के दौरान उनके मन में नोटों से सजी कांवड़ लेकर आने का विचार आया था. उसी संकल्प को पूरा करते हुए इस बार उन्होंने नोटों वाली कांवड़ तैयार कराई है. कांवड़ में कितने रुपये के नोट लगे हैं, इसका कोई हिसाब नहीं रखा गया. उन्होंने बताया कि जितने नोट लगते गए, उन्हें कांवड़ पर सजाते गए. इसमें 10, 20, 50 और 100 रुपये के नोट लगाए गए हैं. बारिश से नोट खराब न हों, इसके लिए पूरी कांवड़ को विशेष पन्नी से ढक दिया गया है. दीपांशु ने बताया कि दिल्ली पहुंचने के बाद कांवड़ से सभी नोट उतारकर उन्हें शिवालय में दान किया जाएगा.
मंदिर में इन रुपयों से भंडारे का आयोजन कराया जाएगा या फिर जरूरतमंद लोगों की सहायता की जाएगी. उन्होंने बताया कि यह उनकी पहली नोटों वाली कांवड़ है. इस बार उन्होंने भोलेनाथ से एक मन्नत भी मांगी है. यदि उनकी मनोकामना पूरी होती है तो अगले वर्ष इससे भी बड़ी और अधिक नोटों से सजी कांवड़ लेकर हरिद्वार आएंगे. दीपांशु के साथी तरुण ने बताया कि उनकी कोई विशेष मनोकामना नहीं है. हर वर्ष की तरह इस बार भी भोले बाबा की भक्ति में कांवड़ लेने आए हैं, लेकिन इस बार कुछ अलग करने की इच्छा से नोटों वाली कांवड़ तैयार की गई.
उन्होंने बताया कि इस कांवड़ को तैयार करने में नौ लोगों ने लगातार एक दिन और एक रात मेहनत की, तब जाकर यह तैयार हो सकी. कांवड़ मेले में श्रद्धा और भक्ति की अनेक मिसाल देखने को मिलती हैं. बागपत जिले के ग्राम चिरचिट से आए दो सगे भाई संजीव कुमार और अनिल कुमार ने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर 200 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा करा रहे हैं. पहली बार कांवड़ लेने हरिद्वार आए संजीव कुमार और अनिल कुमार हरकी पैड़ी से गंगा जल भरने के बाद अपने पिता वेदराम और माता राजेंद्र को कांवड़ में बैठाकर बागपत के लिए रवाना हुए.