विकासनगर: देहरादून जनपद के विकासनगर-जौनसार बावर क्षेत्र मे बूढ़ी दीपावली के जश्न में डूबा हुआ है. ग्रामीण लोक गीतों और ढोल दमाऊ की थाप पर जमकर थिरक रहे हैं. हाथों में होले (मशालें) जलाकर बूढ़ी दीपावली का आगाज किया. कई खत पट्टियों में बूढ़ी दीपावली मनाई जा रही है.
जहां एक ओर दीपावली आतिशबाजी के साथ मनाई जाती है. वहीं जनजातीय समुदाय जौनसार बावर क्षेत्र में इको फ्रेंडली बूढ़ी दीपावली मनाने की परम्परा है. ग्रामीण सुबह उठकर भीमल के लकडी की पतली डंडियों से होले (मशालें) तैयार कर पंचायती आंगन मे एकत्रित होते हैं. वाद्य यंत्रों की थाप पर दीपावली के गीत और ईष्ट देव को याद करते हुई होले पर्व मनाते हैं. उसके बाद सभी ग्रामीण वापस आकर पंचायती आंगन मे हारूल गीत और नृत्य का जश्न शुरू हो जाता है. इस लोक पर्व को मनाने के लिए नौकरी पेशा करने वाले लोग अपने पैतृक गांव पहुंचते हैं
पांच दिन तक बूढ़ी दीपावली का पर्व मनाते हैं. इस पर्व की खास बात यह है की इसमें आतिशबाजी नहीं होती और इको फ्रेंडली दीपावली मनाई जाती है. पर्व पर अखरोट और चिवड़ा का बड़ा महत्व है. सबसे पहले अखरोट और चिवड़ा अपने इष्ट देव को अर्पित किया जाता है. पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व पर गांवों के पंचायती आंगन लोक गीतों और नृत्यों गुलजार रहते हैं. जौनसार बावर के दसऊ पशगांव खत पट्टी समेत अन्य कुछ खत पट्टियों में देशभर के साथ दीपावली मनाई गई. जबकि खत पट्टियों में बूढ़ी दीपावली मनाने की परंपरा है, जिसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है.
मान्यता है कि जिस खत पट्टी मे चालदा महासू देवता प्रवास पर होते हैं, वहां देशभर के साथ दीपावली पारंपरिक तरीके से मनाई जाती है. बूढ़ी दीपावली जौनसार बावर मे सामूहिक रूप से मनाई जाती है. यह त्यौहार एक महीने बाद क्यों होता है, इसके पीछे कई कहानियां हैं. कुछ लोग इस पर्व को महासू देवता से जोड़ते हैं और कुछ लोग कामकाज के फुर्सत के क्षणों मे मनाए जाने की बात कहते हैं. लोक मान्यता है कि 14 वर्षों का वनवास काट कर जब श्रीराम अयोध्या लौटे, इसकी जानकारी लोगों को एक महीने बाद पता चली. जिसके बाद पर्व मनाया गया.