देहरादून: उत्तराखंड त्रिस्तरीय पंचायत 2025 संपन्न हो चुका है. इसे ‘गांव की सरकार’ भी कहा जाता है. इस चुनाव में कई रोचक नतीजे भी देखे गए. कई जगह बराबर-बराबर वोट होने पर टॉस और पर्ची के जरिए भी हार और जीत का फैसला किया गया तो कहीं री काउंटिंग के बाद नतीजे ही बदल गए. इस चुनाव में कई दिग्गजों की साख ने कहीं परचम लहराया तो कहीं डूबती नैया को पार कराने में असफल रहे. लेकिन सबसे खास बात उन युवाओं की रही, जिन्होंने सबसे कम उम्र में जन प्रतिनिधि बनकर एक नई मिसाल पेश की है. आइए जानते हैं उन युवाओं के बारे में.
21 साल की प्रियंका नेगी बनीं प्रधान: चमोली जिले के गैरसैंण विकासखंड के आदर्श ग्राम सारकोट की 21 वर्ष 3 माह की प्रियंका नेगी पंचायत चुनाव 2025 में चमोली जिले की सबसे कम उम्र की प्रधान बनीं. चुनाव में प्रियंका नेगी को 421 और प्रतिद्धंदी प्रियंका देवी को 235 वोट मिले. प्रियंका नेगी राजनीति शास्त्र से ग्रेजुएट हैं. प्रियंका के पिता राजेंद्र नेगी पूर्व में सारकोट ग्राम सभा के दो बार प्रधान रह चुके हैं. खास बात है कि प्रियंका जिस गांव की प्रधान बनी हैं, उस गांव को सीएम पुष्कर सिंह धामी ने गोद लिया है.

गैरसैंण विकासखंड के आदर्श ग्राम सारकोट की प्रधान बनीं प्रियंका नेगी. (PHOTO- ETV Bharat)
21 साल की कंचन बनीं प्रधान: टिहरी गढ़वाल के विकासखंड थौलधार के ग्राम नकोट गुसाईं में 21साल 6 माह कंजन प्रधान बनी हैं. कंचन ने जिले की सबसे कम उम्र की प्रधान बनने का तमगा भी हासिल कर लिया है. जीआईसी मैंडखाल से इंटर कर चुकी कंचन चार भाई बहनों में सबसे छोटी हैं. उनके पिता गिरीश गांव में राज मिस्त्री का काम करते हैं और माता गृहणी हैं.

कंचन कहती हैं कि उन्हें इस बात की भी मन में टीस है कि चुनाव जीतने के बाद लोग वादे भूल जाते हैं और वे वादे कागजों में दफन हो जाते हैं. इन्हीं सब चीजों की ठसक ने उसे जनप्रतिनिधि बनने के लिए सीख दी. उसकी प्राथमिकता गांव के आंतरिक रास्ते, पेयजल, जरूरी प्रमाणपत्रों को बनाने में जरूरतमंद लोगों का सहयोग करना है.
21 साल की तनुजा बिष्ट बनीं प्रधान: चंपावत जिले के ग्राम पंचायत शक्तिपुर बुंगा में भी युवा के पक्ष में बड़ा उलटफेर देखने को मिला. यहां बीएससी पास 21 साल की तनुजा बिष्ट ने गांव से सभी धुरंधर प्रत्याशियों को शिकस्त देते हुए प्रधान पद पर जीत हासिल की. तनुजा का कहना है कि वह युवा सोच के साथ गांव के विकास में भागीदार बनकर गांव का विकास करना चाहती हैं.
22 साल की साक्षी बनीं प्रधान: पौड़ी गढ़वाल जिले के पाबौ ब्लॉक के कुई ग्राम पंचायत की 22 वर्षीय साक्षी ने प्रधान पद पर कब्जा किया. साक्षी ने देहरादून से बीकेट किया है और अब तकनीकियों के साथ गांव का विकास करने का मन बना चुकी हैं.

22 वर्षीय ईशा बनीं प्रधान: पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी विकासखंड के क्विरिजिमिया ग्राम पंचायत की 22 वर्षीय ईशा प्रधान बनी हैं. ईशा बीएड पास हैं और अब गांव के विकास को आगे बढ़ाने का जुनून रखती हैं. ईशा का कहना है कि वह गांव के विकास लेकर पूरी मेहनत करेंगे. साथ ही युवाओं को भी गांव के विकास के लिए सहभागी बनने के लिए प्रोत्साहित करेंगे.

23 साल के नितिन नेगी बने प्रधान: चमोली जिले के दसोली ब्लॉक के बणद्वारा ग्राम प्रधान पद का चुनाव भी काफी रोचक रहा. प्रधान पद के प्रत्याशी 23 वर्षीय नितिन नेगी और प्रतिद्वंदी रविंद्र के बीच कांटे की टक्कर रही. अंत में दोनों को 138-138 वोट मिले. जिसके बाद निर्वाचन आयोग नियमावली के तहत टॉस उछालकर निर्णय लिया गया, जिसमें नितिन नेगी ने प्रधान पद पर कब्जा किया.

25 वर्षीय नेहा और राहुल बने बीडीसी मेंबर: उधम सिंह नगर के खटीमा के कुटरी क्षेत्र पंचायत सीट से नेहा जोशी ने जीत दर्ज की है. 25 साल 8 माह का नेहा जोशी खटीमा विकासखंड में सबसे कम उम्र के बीडीसी (क्षेत्र पंचायत सदस्य) बनने वाले जनप्रतिनिधि है. वहीं खटीमा के ही भुड़ाई क्षेत्र पंचायत सीट पर राहुल भंडारी ने जीत हासिल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. 25 वर्षीय राहुल भंडारी खटीमा विकासखंड में सबसे कम उम्र के बीडीसी बने हैं. दोनों प्रत्याशियों ने इससे पहले कोई चुनाव नहीं लड़ा था. पहली बार इन दोनों युवा प्रत्याशियों ने पंचायत चुनावी समर में नामांकन करा ताल ठोकी थी. दोनों युवा प्रत्याशियों ने पहली बार में ही जीत दर्ज कर इतिहास रचा है.

सबसे कम उम्र की जिला पंचायत सदस्य बनीं इशिता: टिहरी गढ़वाल जिले के चंबा विकासखंड की सदस्य जिला पंचायत कोट से इशिता सजवाण ने जीत हासिल की है. इशिता जिले में सबसे कम उम्र (27 वर्षीय) की जिला पंचायत सदस्य बन चुकी हैं. इशिता सजवाण ने अपनी प्राथमिक शिक्षा नई टिहरी के कॉन्वेंट स्कूल से की. इसके बाद दिल्ली और पुणे जैसे शहरों से उच्च शिक्षा प्राप्त की. 27 वर्षीय गाजणा निवासी इशिता ने एमबीए, एमए साइकोलॉजी की पढ़ाई की है.

इशिता ने बताया कि तीन साल पहले एक एनजीओ के माध्यम से उन्होंने और उनकी टीम ने पहाड़ के बच्चों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए काम शुरू किया था. उसी दौरान गांव के लोगों के संघर्षमय दिनचर्या और जरूरतों ने उनके मन में पहाड़ में रहकर ही कुछ करने की अलख जगाई. ऐसे में उन्होंने बुनियादी सुविधाएं, रास्ते, पेयजल, रोजगार, शिक्षा आदि के लिए राजनीति में आकर जनभावनाओं के अनुरूप जनप्रतिनिधि के रूप में पूरा करने की कोशिश शुरू की है.