देहरादून: उत्तराखंड में सरकारी डॉक्टर बनने का मौका मिलने के बाद अगर पहाड़ में तैनाती से इनकार किया तो भविष्य में सरकारी चिकित्सक बनने का रास्ता बंद हो सकता है. प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी है, लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती मिलने के कारण कई डॉक्टर नियुक्ति ही नहीं ले रहे हैं. हाल ही में हुई भर्ती में भी करीब 30 प्रतिशत डॉक्टरों ने ज्वाइन नहीं किया. ऐसे में अब सरकार भर्ती नियमों को सख्त करने जा रही है. नई नियमावली के तहत नियुक्ति मिलने के बाद ज्वाइन न करने वाले डॉक्टरों को दोबारा सरकारी सेवा में मौका नहीं देने का प्रावधान किया जा रहा है.
उत्तराखंड में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए की जा रही भर्तियों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं. स्थिति यह है कि चयनित होने के बाद भी बड़ी संख्या में डॉक्टर अपनी तैनाती वाले अस्पतालों में पहुंचकर सेवाएं शुरू नहीं कर रहे हैं. खासकर पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती मिलने पर डॉक्टरों के पीछे हटने की समस्या सामने आ रही है. इससे सरकार की भर्ती प्रक्रिया पर खर्च होने वाले संसाधनों के साथ ही अस्पतालों में मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने की कोशिशों को भी झटका लग रहा है.
भर्ती नियमों में बदलाव की तैयारी: इस समस्या से निपटने के लिए सरकार अब भर्ती नियमों में बदलाव की तैयारी कर रही है. प्रस्ताव यह है कि सरकारी अस्पतालों में नियुक्ति मिलने के बाद ज्वाइन नहीं करने वाले डॉक्टरों को भविष्य में दोबारा भर्ती का अवसर न दिया जाए. इसी तरह नौकरी ज्वाइन करने के बाद बीच में छोड़ने वाले डॉक्टरों को भी नई भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने से रोकने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं. हालांकि इस व्यवस्था का अंतिम स्वरूप नियमावली में संशोधन के बाद ही स्पष्ट होगा.
करीब 250 एमबीबीएस डॉक्टरों का चयन किया गया: स्वास्थ्य विभाग की ओर से हाल ही में करीब 250 एमबीबीएस डॉक्टरों का चयन किया गया था. चयन के बाद इन डॉक्टरों को राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनाती दी गई. इसके बावजूद करीब 76 डॉक्टरों ने अब तक ज्वाइन नहीं किया है. यानी चयनित डॉक्टरों में लगभग 30 प्रतिशत अपनी सेवाएं देने के लिए नहीं पहुंचे. विभाग की ओर से डॉक्टरों को कार्यभार ग्रहण करने के लिए तीन महीने तक का समय भी दिया गया, लेकिन इसके बाद भी सभी पदों पर नियुक्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी.
अधिकांश डॉक्टरों को पहाड़ों में तैनाती दी गई थी: इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टरों की तैनाती से जुड़ा है/. ज्वाइन नहीं करने वाले अधिकांश डॉक्टरों को पहाड़ के अस्पतालों में भेजा गया था. दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती, सीमित सुविधाएं और व्यक्तिगत परिस्थितियां डॉक्टरों के लिए चुनौती बनती हैं. कई बार डॉक्टर नियुक्ति स्वीकार नहीं करते, जबकि कुछ ज्वाइन करने के बाद भी नौकरी छोड़ देते हैं. इसका परिणाम यह होता है कि जिन अस्पतालों में चिकित्सकों की सबसे अधिक जरूरत है, वहां पद खाली बने रहते हैं.सरकार की दोहरी चुनौती: सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक ओर डॉक्टरों के खाली पद भरने हैं, वहीं दूसरी ओर चयनित चिकित्सकों को निर्धारित स्थान पर सेवाएं देने के लिए भी सुनिश्चित करना है. बार-बार भर्ती प्रक्रिया अपनाने के बावजूद यदि चयनित डॉक्टर ज्वाइन नहीं करते हैं, तो इसका सीधा असर दूरस्थ क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है.
पहाड़ी इलाकों में डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को सामान्य उपचार के लिए भी दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ सकता है. स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि
इस समस्या को देखते हुए डॉक्टरों की भर्ती नियमावली में बदलाव किया जाएगा. अधिकारियों को इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं. सरकार का उद्देश्य ऐसे नियम तैयार करना है, जिनसे नियुक्ति मिलने के बाद डॉक्टरों के बिना सेवाएं दिए भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो जाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके.
-सुबोध उनियाल, स्वास्थ्य मंत्री उत्तराखंड-
सरकार की इस पहल का चिकित्सा सेवा संघ ने किया स्वागत: सरकार की तरफ से लिए गए इस फैसले पर डॉक्टर्स का भी समर्थन देखने को मिल रहा हैं. चिकित्सकों का कहना है कि डॉक्टर्स की भर्ती में लम्बा वक्त लगता है, ऐसे में यदि चिकित्सक के रूप में चयन होने के बाद तैनाती नहीं ली जाती है तो बेवजह समय की बर्बादी होती है. इसलिए सरकार को नियम में बदलाव करके इस पर फैसला ले लेना चाहिए. उत्तराखंड चिकित्सा सेवा संघ के अध्यक्ष रमेश कुंवर की माने तो सरकार ने इस विषय पर जो विचार किया है वो सही है, और ऐसा होने से व्यवस्थाएं ठीक होंगी.